शानदार अभिनेता और जानदार शख्सियत थे ऋषि कपूर...

शानदार अभिनेता और जानदार शख्सियत थे ऋषि कपूर...


# तहलका 24x7 न्यूज़ की तरफ से मशहूर अभिनेता ऋषि कपूर को श्रद्धांजलि


# चॉकलेटी हीरो से लेकर मुराद अली तक के शानदार सफर का पटाक्षेप


स्पेशल डेस्क
सौरभ सेठ
तहलका 24x7 
              "मेरा नाम जोकर" फ्लॉप हो चुकी थी.. शोमैन राज कपूर गाढ़े कर्जे में थे.. इन्वेस्टर्स का दबाव बहुत ज्यादा था.. मांग थी कि कोई लव स्टोरी बनाई जाए ताकि नुकसान की भरपाई हो सके। राजकपूर ने कहानी तैयार कर ली। उस वक़्त राजेश खन्ना सुपरस्टार थे, राजकपूर ने कास्टिंग के लिए उनको ही चुना लेकिन राजेश खन्ना ने इतनी ज्यादा फीस मांग ली कि राजकपूर को पीछे हटना पड़ा। उन्होंने तय किया कि एकदम नए एक्टर्स के साथ फ़िल्म बनाएंगे। फ़िल्म बनी और इतिहास रच दिया सुपरहिट कहानी और सुपरहिट हीरो की फ़िल्म का नाम था "बॉबी" और हीरो थे राजकपूर के बेटे ऋषि कपूर यानी चिंटू जी..
ऋषि बतौर हीरो बॉलीवुड में स्थापित हो गए और राजकपूर का सारा कर्ज भी उतर गया। "बॉबी" के बाद ऋषि ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और बॉलीवुड को मिल गया एक और चॉकलेटी स्टार... 



ऋषि को अभिनय विरासत में मिला था लेकिन कामयाबी के लिए जरूरी था कि वो खुद को साबित करते रहें। 70 और 80 के दशक में अमिताभ जैसे मेगास्टार का सिक्का चलता था। बावजूद इसके, ऋषि ने अपनी काबिलियत के दम पर सिनेप्रेमियों के दिल में एक अलग जगह बनाई। "रफू चक्कर" , "सरगम" और "लैला मजनू" जैसी फिल्मों ने उन्हें बतौर अभिनेता स्थापित कर दिया लेकिन उनको ज्यादातर भूमिकाएं अमिताभ के सहायक हीरो की मिल रही थीं। ऋषि ने "कभी कभी" और "अमर अकबर एंथोनी" जैसी ब्लॉकबस्टर में अमिताभ के साथ स्क्रीन शेयर भी किया लेकिन 1980 में आई सुभाष घई की फ़िल्म "कर्ज़" ने उनकी दुनिया बदल दी। पुनर्जन्म जैसे दिलचस्प प्लॉट पर बनी इस शानदार फ़िल्म ने सफलता के झंडे गाड़ दिए। फिल्म के गाने लोगों की ज़ुबान पर थे और दिलों में थे खुद ऋषि कपूर... 



"कर्ज़" के बाद ऋषि ने एक से बढ़कर एक फिल्में कीं और कपूर खानदान की विरासत को समृद्ध किया। "प्रेम रोग" रही हो या "सागर", "नसीब" रही हो या "ये वादा रहा" ऋषि झंडे गाड़ते चले गए। उनका स्टारडम ही था कि जिस वक्त अमिताभ थोक के भाव फिल्में करने के बावजूद हिट नहीं दे पा रहे थे, तब ऋषि कपूर ने "चांदनी", "हिना", "बोल राधा बोल", "दामिनी", "दीवाना", "साजन का घर" और" याराना" जैसी सफल फिल्में दीं। ये वो दौर था जब बॉलीवुड में खान तिकड़ी की एंट्री हो चुकी थी और सन्नी देओल, अक्षय कुमार और अजय देवगन जैसे तमाम नए चेहरे तहलका मचा रहे थे। अधेड़ हो चुके ऋषि अपने बढ़े हुए वजन और मुख्य भूमिकाओं के अकाल के बीच जैसे तैसे आगे बढ़ रहे थे। ऐसे में उन्होंने पिता की तरह निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखा और अक्षय खन्ना -ऐश्वर्या राय को लेकर "आ अब लौट चलें" बनाई। फ़िल्म कुछ खास नहीं कर सकी और ऋषि के सितारे भी गर्दिश में पहुंच गए... 



कहते हैं कि इंसान में वक़्त पहचानने का हुनर होना चाहिए। ऋषि ने भी फिल्मों में चाचा और पिता की महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभानी शुरू कर दी थीं। वो "हम तुम" लव आजकल"," नमस्ते लंदन" और "जब तक है जान" जैसी सुपरहिट फिल्मों का हिस्सा भी रहे लेकिन उन्हें एक बार फिर शानदार कामयाबी दिलाई "दो दूनी चार" ने.. " बॉबी" और "सागर" की को-स्टार डिम्पल कपाड़िया के साथ उनकी इस कॉमेडी फिल्म ने धूम मचा दी और फिल्मफेयर तक दिलाया। 2012 से 2019 के बीच का दौर ऋषि कपूर के करियर का बहुत महत्वपूर्ण दौर रहा। उन्होंने इस बीच बेहद शानदार भूमिकाएं निभाईं। "अग्निपथ" के रऊफ लाला का किरदार भला कौन भूल सकता है ? फ़िल्म "डी-डे" में इरफान की सोहबत में निभाया गया इकबाल सेठ का किरदार कितना तो सूट किया था ऋषि पर.. उन्होंने "कपूर एंड सन्स" में दादा जी के किरदार में तहलका ही मचा दिया और सहायक अभिनेता का फिल्मफेयर जीत लिया। पुराने जोड़ीदार अमिताभ के साथ मिलकर "102 नॉट आउट" में दिखे और खूब प्यार बटोरा.. इसी समय फ़िल्म "मुल्क" में उनके द्वारा निभाये गए मुराद अली के किरदार ने लोगों पर जबरदस्त छाप छोड़ी। भारतीय मुसलमान के रोल में ऋषि ने बेहद उम्दा अभिनय किया, चर्चा में रहे और फ़िल्म खूब हिट हुई... 



ऋषि कपूर की एक खास बात रही.. वो अपने समकालीनों से इतर बेबाक और सच्चे रहे.. शायद इसीलिए उन्हें तमाम विवादों का सामना भी करना पड़ा। हर मौजूं मसले पर अपनी राय रखना उनकी खासियत ही कही जाएगी। वो हर दौर में स्टाइल आइकॉन भी रहे। कभी एक साक्षात्कार में उनसे बड़ा दिलचस्प सवाल पूछा गया कि लोग मानते हैं, वो शानदार एक्टर हैं लेकिन अंडररेटेड रहे हैं? जवाब में ऋषि हंस देते हैं.. फिर कहते हैं कि "ये सब कहने की बात है मेरा सिर्फ यही मकसद रहा कि जो करूं, अपनी पूरी ताकत से करूं..." 



अपने आखिरी वीडियो में एक प्रशंसक से वो कहते हैं कि "खूब मेहनत करो.. शोहरत आती है मेहनत के बाद.. मेहनत और थोड़ी किस्मत होती है तो आदमी ज़रूर कामयाब होता है।" उनकी ये बातें उनकी पूरी ज़िंदगी का फलसफा है। उनकी गैर मौजूदगी लोगों को अहसास कराएगी कि दरअसल वो क्या थे ? 

अलविदा ! चिंटू जी...

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