आज चलते हैं 'पद्मावत' से चर्चित महान रचनाकार मलिक मोहम्मद जायसी के गाँव जायस में |

आईये चलते हैं 'पद्मावत' से चर्चित महान रचनाकार मलिक मोहम्मद जायसी के गाँव जायस में  ..एस एम् मासूम 



आज उस महान रचनाकार मलिक मोहम्मद जायसी के जन्मस्थान जायस में जा पहुंचा जिसकी रचना 'पद्मावत'  के नाम पे सौ दो सौ करोड़ की फिल्म तो बन जाती है लेकिन जन्मस्थल बदहाल ही रहा। उत्तर प्रदेश के अमेठी से तकरीबन 38  किलोमीटर दूर जायस एक कस्बा है जहां कभी कभी महान सूफी संत मलिक मोहम्मद जायसी का जन्म हुआ था। मलिक मोहम्मद जायसी  से खुद ही लिखा है। 


जायस नगर मोर अस्थानू।
नगरक नांव आदि उदयानू।।
तहां देवस दस पहुने आएऊं।
भा वैराग बहुत सुख पाएऊं।।


जिससे पता चलता है की उनका जन्म जायस के एक मोहल्ले उदयान (प्राचीन नाम ) में हुआ था। जायसी का जन्म सन १५०० के आसपास माना जाता है। मलिक मोहम्मद जायसी मलिक मुहम्मद जायसी (1467-1542) हिन्दी साहित्य के भक्ति काल की निर्गुण प्रेमाश्रयी धारा के कवि थे। उनकी २१ रचनाओं के उल्लेख मिलते हैं जिसमें पद्मावत, अखरावट, आख़िरी कलाम, कहरनामा, चित्ररेखा आदि प्रमुख हैं। इसमें पद्मावती की प्रेम-कथा का रोचक वर्णन हुआ है। रत्नसेन की पहली पत्नी नागमती के वियोग का अनूठा वर्णन है। इसकी भाषा अवधी है। मनेर शरीफ से प्राप्त पद्मावत के साथ अखरखट की कई हस्तलिखित प्रतियों में इसका रचना काल दिया है। "अखरावट' की हस्तलिखित प्रति पुष्पिका में जुम्मा ८ जुल्काद ९११ हिजरी का उल्लेख मिलता है। इससे अखरावट का रचनाकाल ९११ हिजरी या उसके आस पास प्रमाणित होता है। अखरावट जायसी कृत एक सिद्धांत प्रधान ग्रंथ है। इस काव्य में कुल ५४ दोहे ५४ सोरठे और ३१७ अर्द्धलिया हैं। इसमें दोहा, चौपाई और सोरठा छंदों का प्रयोग हुआ है। उनके पिता का नाम मलिक राजे अशरफ़ बताया जाता है और कहा जाता है कि वे मामूली ज़मींदार थे और खेती करते थे।


जायसी एक सन्त प्रकृति के गृहस्थी थे। इनके सात पुत्र थे लेकिन दीवार गिर जाने के कारण सभी उसमें दब कर मर गये थे। तभी से इनमें वैराग्य जाग गया और ये फ़कीर बन गये। इनकी मृत्यु की तारिख के बारे में भी मतभेद है और कहा जाता है की अमेठी के  आस पास के जंगलो में भटकते हुए उनकी मृत्यु हुए और वहाँ के राजा ने वहीँ उनकी समाधी बनवा दी जो आज भी अमेठी के रामनगर इलाक़े में मौजूद है। कहा जाता है कि जायसी के आशीर्वाद से अमेठी नरेश के यहॉ पुत्र का जन्‍म हुआ। तबसे उनका अमेठी के राजवंशमें बड़ा सम्‍मान था। प्रचलित है कि जीवन के अन्तिम दिनों में ये अमेठी से कुछ दूर मॅगरा नाम के वन में साधना किया करते थे। वहीं किसी के द्वारा शेर की आवाज के धोखे में इन्‍हें गोली मार देने से दनका देहान्‍त हो गया था।


मालिक मुहम्मद जैसी का घर देखने रायबरेली के जायस इलाक़े में जाना हुआ जो अमेठी से २८ किलोमीटर दूरी पे अमेठी और रायबरेली के बॉर्डर पे स्थित है। जायस नाम के इलाक़े को देख के लगता है की जैसे किसी टीले में लखौरी से बने खंडहरों का छोटा सा क़स्बा है वही में मालिक मुहम्मद जैसी के घर की निशानी के रूप में बस एक दीवार बची है। जायसी की जन्मस्थली पे उनकी पुण्य स्मृति में बनाया गया पुस्तकालय व शोध संस्थान की हालत भी बदहाल दिखाई देती है। 


जायस के बाद वहाँ से २८  किलोमीटर दूर अमेठी जिले के रामनगर में जायसी की दरगाह है. वहां लोग इस पीर के पास अपनी मन्नतें मांगने और दुआ के लिए आते हैं।  यह मज़ार अमेठी से केवल  किलोमीटर की दूरी पे स्थित है और इसकी हालत अच्छी हैं। 


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