वाराणसी : तहलका 24x7 विचारमंथन ! कबीरदास जी के 500वें निर्वाण वर्ष पर प्रधानमंत्री के मगहर दौरे पर विशेष
वाराणसी : तहलका 24x7 विचारमंथन ! कबीरदास जी के 500वें निर्वाण वर्ष पर प्रधानमंत्री के मगहर दौरे पर विशेष
वाराणसी।अंकित मिश्रा
तहलका 24x7
अपने देश की माटी के जीवंत धरोहर संत कबीर के 500वें निर्वाण वर्ष पर उनसे जुड़े कुछ प्रसंगों पर चर्चा कर रहे हैं। संत कबीर एक ऐसे इकलौते संत हैं जिन्होंने अपने को न तो कभी हिन्दू माना और ना ही मुसलमान बल्कि इंसानियत की राह पर चलने वाला इंसान माना है। कबीर साहब की उल्टी वाणी आज भी दुनिया को एक नयी दिशा दिखाकर दुनिया मे मिशाल बनी हुयी है। संत कबीरदास का दर्शन "सबका साथ सबका विकास" आज भाजपा का राष्ट्रीय नारा बन गया है और इसी नारे के सहारे भाजपा अपनी राजनैतिक नौका को आगे बढ़ा रही है।
कबीर दास की कहावतें और पद आज भी प्रासंगिक बने हुये है और उन पर शोध हो रहे हैं जबकि कबीर साहब अगूंठा टेक अनपढ़ थे। कबीर साहब कहते थे कि "कबिरा खड़ा बाजार में सबकी माँगै खैर, नाही काँहू से दोस्ती न काँहू से बैर" इतना ही नहीं वह कहते थे कि "कबिरा खड़ा बाजार में लिहे लूकेठा हाथ, जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ" कबीर साहब की वाणी समाजिक धार्मिक एवं अध्यात्मिक उर्जा प्रदान करने वाली है क्योंकि वह कहते थे कि " पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोई, ढ़ाई आखर प्रेम का पढ़ै सो पंडित होय" इतना ही वह हमेशा अपनी भक्ति के बल पर कहा करते थे कि "जब कबिरा काशी मरै तो रामै कौनु निहोर" सभी जानते हैं कि शास्त्रों में काशी बनारस को मुक्ति का धाम माना गया है और ऐसी मान्यता है कि काशी में मरने वाला आवागमन से मुक्ति पाकर सीधे स्वर्ग लोक पहुंच जाता है। कबीर साहब कहते थे कि काशी में मरने पर तो सबको मोक्ष मिलता है लेकिन मगहर में मरने पर नर्क मिलता है इसलिए हम नर्क जाने वाले स्थान पर रहकर मोक्ष को प्राप्त करूँ तब तो कोई बात हुई। यहीं कारण था कि कबीर साहब अपना मूल स्थान काशी छोड़कर मगहर चले गये थे। कबीरदास जी ने 1518 में शरीर त्याग किया था तबसे मगहर नरक द्वार नहीं बल्कि मोक्ष का धाम कहा जाने लगा है। कबीर साहब के नाम से उनका पंथ चल रहा है और अब नये जिले का नाम भी संत कबीरनगर से किया गया है।संत कबीरदास जी को चाहने वाले दुनिया में चालीस करोड़ से भी ज्यादा है और गुजरात में कबीर कुंभ का आयोजन गुजरात में 2011 में हो चुका है जिसमें नरेन्द्र मोदी जी बतौर मुख्यमंत्री समापन सत्र को संबोधित कर चुके हैं।
पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम मगहर को अन्तर्राष्ट्रीय पर्यटन केन्द्र बना कर दुनिया को दिखाना चाहते थे कि हमारी संस्कृति क्या है? मगहर में आज भी कबीर साहब की मजार और समाधि दोनों बनी है और दोनों समुदायों के लोग इनके दर्शन से जुड़े हैं। कबीर साहब पहले देवदूत हैं जिन्होंने अपने जीवनकाल में अपने हाथों कुछ भी नहीं लिखा बल्कि उनके भक्तों ने जरूर उनकी बाणी को संकलित किया है।1997 में यह नया जिला तो बन गया था लेकिन यहाँ का पिछड़ापन अभी भी पहले जैसा बरकरार है और इसकी तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया। अगर ध्यान दिया गया होता तो आज मगहर इंसानियत का पाठ पढ़ाने वाला दुनिया का इकलौता तछशिला जैसा विश्वविद्यालय बन गया होता और दुनिया के लोग सबक लेने आते होते।कबीर की पावन स्थली मगहर में कल पहली बार प्रधानमंत्री ने दौरा करके जनसभा को संबोधित करते हुए कबीर गुण गाते हुए विभिन्न योजनाओं का जिक्र किया है।
आजतक किसी भी राजनैतिक दल ने मगहर से अब तक चुनावी अभियान की शुरुआत नहीं की है लेकिन मोदीजी ने आगामी लोकसभा चुनाव का शंखनाद जैसे कर दिया है। मोदीजी अपने को नया नहीं बल्कि पुराना कबीरपंथी बताते हुये उनके बताए मार्ग का अनुयायी बता रहे हैं। जिस तरह कबीर साहब को घर परिवार की चिंता नहीं थी उसी तरह मोदीजी को भी घर परिवार की चिंता नहीं है। इस देश के राजनेताओं की विडम्बना रही है कि वह राजनैतिक लाभ के लिये धार्मिक सहारा लेते है लेकिन बाद में भूल जाते हैं।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी कबीर साहब की ड्योढ़ी से आगामी लोकसभा चुनाव का चुनावी सिंहनाँद करके उन्होंने राजनैतिक पारी की शुरुआत की है परिणाम भविष्य के गर्त में छिपा हुआ है।

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