वाराणसी : धधकती चिताओं के बीच भींगी पलकों से नगर वधुओं ने अर्पित की नृत्यांजली
एक ओर धधकती चिताओं की आग थी तो दूसरी तरफ भक्ति और फिल्मी गानों पर घुँघुरुओं की झंकार
धधकती चिताओं के बीच नगरवधुओं के पाँव की घुंघुरू रात भर बजते रहे और टूटकर बिखरते रहे
वाराणसी।
दुर्गेश गिडवानीतहलका 24x7
धर्म की नगरी काशी में चैत्र नवरात्र पर सप्तमी के दिन महाश्मशान घाट पर सजने वाले अनूठे महफ़िल में धधकती चिताओं के बीच नगरवधुओं के पाँव के घुंघुरू रात भर बजते और टूटकर बिखरते रहे। कभी न ठंडी होने वाली मणिकर्णिका घाट पर एक तरफ धधकती चिताओं की आग थी तो दूसरी ओर भक्ति और फिल्मी गानों पर घुँघुरुओं की झंकार "मोक्ष नगरी काशी" में मौत भी उत्सव है के कहावत को चरितार्थ कर रही थी। बाबा महाश्मशान को साक्षी मानकर यह नगरबधुएं इसलिए नृत्य करती हैं कि उन्हें भरोसा है कि अगले जन्म में इस नर्क को उन्हें भोगना नहीं पड़ेगा।
मणिकर्णिका घाट पर महाश्मशान नाथ के श्रृंगारउत्सव में 351वें वर्ष की परंपरा के अनुसार गणिकाओं ने नृत्य-संगीत का नजराना पेश किया। तीन दिन चलने वाले महाश्मशान महोत्सव की आखिरी निशा को शाम करीब आठ बजे से ही मणिकर्णिका महाश्मशान में एक तरफ जहां दर्जन भर से अधिक चिताएं धधक रही थीं तो दूसरी ओर डोमराज की मढ़ी के नीचे नगर वधुएं मशानेश्वर को रिझाने के लिए घुंघरूओं की झंकार बिखेरने की तैयारी कर रही थीं। मंच पर डेढ़ दर्जन नर्तकियों के पांव के घुंघरूओं ने ऐसा समां बांधा कि धधकती चिताओं के बीच शोक और प्रसन्नता का समन्वय देखते ही बन रहा था। इस अद्भुत परम्परा ने देशी संगीत रसिकों, श्रद्धालुओं के साथ ही विदेशी जिज्ञासुओं को दांतों तले उंगली दबाने पर विवश कर दिया । एक तरफ जलती चिताओं की लपटें आसमान से एकाकार तो दूसरी ओर घुंघरुओं की झंकार बंदिशों की दरों दीवार तोड़ इसे अनूठे त्यौहार का रूप दे रही थीं। संध्या पूजन के बाद राग-विराग का मेला घुंघरू के झंकार से शुरू हुआ जो देर रात तक आबाद रहा। सुध-बुध खो कर नृत्यांजली प्रस्तुति करती नगर वधुओ से महाश्मशान पूरी रात तक जीवंत रहा। यह सिलसिला सूर्योदय तक जारी रहा। शहर के शासनिक-प्रशासनिक अधिकारी सहित विशिष्ठ जन इस क्षण के साक्षी बने। इस आयोजन में संस्था के अध्यक्ष चैनु प्रसाद, व्यवस्थापक गुलशन कपूर, विजय शंकर पांडेय, महंत संजय झिगरन, बिहार लाल गुप्ता ने सहयोग किया।
# दिल्ली व मुम्बई से आई नगर वधुएं
महाश्मशान नाथ सेवा समिति के अध्यक्ष चैनु प्रसाद ने बताया कि स्थानीय के साथ ही प्रतापगढ़, मुम्बई, दिल्ली सहित कलकत्ता से नगर वधुएं परम्परा निभाने आई हैं। नगर वधुओं का कहना था कि बाबा का श्रृंगारउत्सव उनके लिए महत्वपूर्ण होता है। शायद यह पहली ऐसी परम्परा है जहां एक देव स्थल पर हमें कार्यक्रम करने का अवसर प्रदान किया जाता है। ईश्वर से यही कामना है कि जबतक जीवन रहे तबतक बाबा श्मशान नाथ के दर पर सेवा का अवसर मिलता रहे।
# बाबा का रच रच कर किया गया भव्य श्रृंगार
शायनकाल बाबा श्मशान नाथ के त्रिदिवसीय श्रृंगार के अंतिम दिन बेला, गुलाब, गेंदा के पुष्पो से भव्य श्रृंगार किया गया। भांग एवं खोए की बर्फी सहित ठंडई का भोग लगाया गया। फिर महाआरती की गई। आरती बाद प्रसाद भक्तो में वितरण किया गया।
# राजा मान सिंह ने शुरू कराई परम्परा
मन्दिर व्यवस्थापक गुलशन कपूर ने बताया कि शहंशाह अकबर के समय मे राजा मान सिंह 16वीं शताब्दी में इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। निर्माण के बाद वहां भजन-कीर्तन होना था पर श्मशान होने की वजह से यहां कोई भी ख्यातिबद्ध कलाकर आने को राजी नहीं हुआ। सभी ने आने से इनकार कर दिया। बाद में नगर वधुओं ने यहां अपनी कार्यक्रम करने की इच्छा जाहिर की और राजा ने उनकी इस आमंत्रण को स्वीकार कर लिया। तब से नगर वधुओं के नृत्य की परम्परा शुरू हुई। शिव को समर्पित गणिकाओं की यह भाव पूर्ण नृत्यांजली मोक्ष की कामना से युक्त होती है।



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