# विशेषांक "मतदान से पहले अवश्य पढ़ें"
शाहगंज/जौनपुर
सौरभ सेठ/रवि शंकर वर्मा
तहलका 24 x 7
निकाय चुनाव के संबंध में मेरी राय.. आप मानने, न मानने के लिये स्वतंत्र हैं..
ये नहीं कह सकता कि वोट किसे दीजिये, आपका अधिकार है, तय भी आप ही करेंगे.. हां, ये ज़रूर बता सकता हूं कि किसे वोट न करें.. निकाय चुनाव का नतीजा आपसे सीधे जुड़ा रहेगा, पांच साल तक, जीवन भर तक.. लड़ भर लेने वालों को जीवन पर्यंत चेयरमैन साब कहने का रिवाज रहा है, जीतने वाले को तो झक मारकर कहना ही पड़ेगा.. क्या आप चाहते हैं कि किसी अपराधी, भ्रष्टाचारी, धनपशु और अयोग्य व्यक्ति को मजबूरी में चेयरमैन कहना पड़े ?
अगर नहीं चाहते तो याद रखिये -
# किसी अपराधी या अपराधियों के संरक्षणदाता को कतई वोट न दें..
# जिसका रिकॉर्ड रहा हो भ्रष्टाचार का, उसे हर हाल में दुत्कारें..
# सिर्फ बातें बनाने वाले भी होंगे, लुभायेंगे, सावधान रहिये, ये जीतने के बाद भी यही करते रह जायेंगे..
# कहीं पुष्ट जानकारी मिले कि फलाने ने पैसा बांटा, शराब पिलाई, वोट खरीदे तो उसे वोट देने का सवाल ही पैदा नहीं होता..
# ये सोचकर वोट मत करिये कि फलाने की हवा है, वही जीतेंगे तो हम वोट काहें बर्बाद करें अपना, उसी को दे देते हैं.. बल्कि तय कीजिये कि कौन वाकई सही प्रत्याशी है, भले हार रहा हो, उसे वोट दीजिये.. कृष्ण ने भी महाभारत में सही का साथ दिया था, जो जीतता दिख रहा था - उसका नहीं..
# वोट देने के लिये अगर आप जाति धर्म को सबसे पहले देखते हैं तो जीतने वाले को भी पूरा हक बनता है कि वो पहले अपनी जाति और धर्म के लोगों को तुष्ट करे.. तब आपका शिकवा करना बेईमानी होगी..
# वोट देने का एक पैमाना प्रत्याशी का स्थानीय होना भी है.. आयातित या सिर्फ चुनाव के दौरान दिखने वाले प्रत्याशी जाली होते हैं..
# सबसे अंत में, पार्टी देखकर वोट न करें, प्रत्याशी देखकर करें.. पार्टियां तो टिकट पैसे से तौलती हैं.. आप अपनी और निकाय की सोचिये..
PS : अगर लग रहा है कि दुर्भाग्यवश सब के सब चट्टे-बट्टे हैं, कोई सही नहीं तो 'नोटा' का विकल्प भी है ही.. और कुछ नहीं तो संतोष रहेगा, कम से कम.. वैसे भी "कम बुरा" चुनना ही हमारा प्रारब्ध है..
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